नर्मदापुरम। गांवों में शराब सिर्फ बोतल में नहीं बिक रही, उसका असर अब घरों की दीवारों तक पहुंच चुका है। कहीं पति-पत्नी के बीच विवाद, कहीं मेहनत की कमाई शराब में उड़ने की शिकायत और कहीं बच्चों के बिगड़ते भविष्य की चिंता। इसी के खिलाफ नर्मदापुरम जिले के अलग-अलग इलाकों में महिलाएं अब घरों से निकलकर सड़क पर उतर आई हैं।
सोमलवाड़ा में महिलाओं ने लाठियां उठाकर अवैध शराब के खिलाफ निगरानी शुरू की तो पिसुआ में 50 से ज्यादा महिलाएं जुलूस लेकर प्रशासन के पास पहुंचीं। सारंगपुर में महिलाओं ने शराब दुकान हटाने की मांग को लेकर चक्काजाम किया और पहले कलेक्ट्रेट पहुंचकर ज्ञापन भी दिया था।
सवाल यह है कि जब महिलाएं गांव की गलियों में शराब के खिलाफ पहरा दे सकती हैं, तो सरकारी तंत्र के पास कार्रवाई के लिए अप्रैल तक इंतजार करने के अलावा कोई रास्ता क्यों नहीं है?
कहीं लाठी, कहीं जुलूस, कहीं चक्काजाम
पिपरिया के पिसुआ में 6 अक्टूबर को 50 से ज्यादा महिलाओं ने प्रदर्शन किया। महिलाओं ने आरोप लगाया कि गांव में महुआ से शराब बनाकर बेची जा रही है। उनका कहना था कि शराब के कारण गांव का माहौल खराब हो रहा है और बच्चे व युवतियां भी प्रभावित हो रही हैं।
महिलाएं जुलूस लेकर तहसील पहुंचीं और तहसीलदार वैभव बैरागी को ज्ञापन सौंपा। इसके बाद थाने पहुंचकर टीआई महेंद्र सिंह बघेल से भी कार्रवाई की मांग की।
पुलिस ने ग्रामीणों से शराब बिक्री की सूचना देने की अपील करते हुए अपना मोबाइल नंबर भी साझा किया।
लेकिन सवाल यहीं खड़ा होता है—क्या अवैध शराब के खिलाफ कार्रवाई के लिए पुलिस को पहले ग्रामीणों से सूचना का इंतजार करना होगा?
सारंगपुर में दो महीने बाद फिर सड़क पर महिलाएं
सारंगपुर की शराब दुकान हटाने की मांग को लेकर महिलाओं का संघर्ष नया नहीं है। 24 अगस्त को महिलाएं कलेक्ट्रेट पहुंची थीं। 21 सितंबर को चक्काजाम किया गया और 6 अक्टूबर को एक बार फिर महिलाएं सड़क पर उतर आईं।
कामती, ढाबा, खापा उर्दोन, घोंगरी, मंगरिया, सारंगपुर, टेकापार, सियारखेड़ा सहित आसपास के गांवों की महिलाएं प्रदर्शन में शामिल हुईं।
महिलाओं का कहना था कि आदिवासी अंचलों में कच्ची शराब की बिक्री पर काफी हद तक रोक लगी है, लेकिन सरकारी ठेके की शराब गांवों के परिवारों को प्रभावित कर रही है। उनके अनुसार बच्चे, युवा और बुजुर्ग तक शराब की गिरफ्त में आ रहे हैं और इसका असर घरेलू जीवन पर पड़ रहा है।
एसडीएम डॉ. बबीता राठौर मौके पर पहुंचीं। महिलाओं ने अपनी परेशानी बताई। लेकिन समाधान के लिए फिर तारीख सामने आई—अगले साल 1 अप्रैल के बाद कार्रवाई।
यानी महिलाओं की परेशानी आज की है, लेकिन सरकारी समाधान अगले वित्तीय सत्र के भरोसे।
मढ़ई में सवाल सिर्फ शराब का नहीं, राजस्व का भी
मढ़ई रोड स्थित शराब दुकान को लेकर महिलाओं का विरोध इस पूरे मामले को और गंभीर बना देता है।
कलेक्टर सोमेश मिश्रा के अनुसार यह शासकीय दुकान है और इसे हटाने की कार्रवाई अगले सत्र में ही संभव होगी। साथ ही उन्होंने अवैध शराब की आपूर्ति पर तत्काल कार्रवाई के निर्देश दिए हैं।
लेकिन इसी दुकान से सरकार को सालाना करीब 10 करोड़ रुपए के राजस्व मिलने की बात सामने आ रही है। यही वह बिंदु है जहां पूरा मामला सिर्फ शराब दुकान हटाने की मांग से आगे निकल जाता है।
मढ़ई और पचमढ़ी जैसे पर्यटन क्षेत्रों में शराब की बिक्री, पर्यटकों की सुरक्षा और स्थानीय सामाजिक माहौल के बीच संतुलन का सवाल भी उठता है।
क्या भारी राजस्व के सामने महिलाओं की शिकायत कमजोर पड़ जाती है?
यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि महिलाएं शराब के सामाजिक दुष्परिणामों की बात कर रही हैं, जबकि व्यवस्था दुकान के नियमों और राजस्व के गणित की बात कर रही है।
नियमों की आड़ में सामाजिक सवाल दबेंगे?
आबकारी अधिकारी डॉ. राजीव द्विवेदी का कहना है कि सारंगपुर की दुकान नियमानुसार संचालित है और आपत्तिरहित स्थल पर है।
कानूनी और प्रशासनिक प्रक्रिया अपनी जगह है। लेकिन ग्रामीण महिलाओं का सवाल इससे अलग है।
वे पूछ रही हैं कि अगर कोई दुकान नियमों के मुताबिक चल रही है, लेकिन उसके आसपास के परिवार उसके प्रभाव से परेशान हैं, तो क्या प्रशासन की जिम्मेदारी सिर्फ नियमों की जांच तक सीमित रहनी चाहिए?
शराब की बिक्री कानूनी है या अवैध—यह एक कानूनी सवाल है।
लेकिन शराब से परिवार प्रभावित हो रहे हैं या नहीं—यह सामाजिक सवाल है।
दोनों सवालों को अलग-अलग देखकर समस्या का समाधान नहीं किया जा सकता।
अवैध शराब का नेटवर्क कौन चला रहा है?
सोमलवाड़ा की महिलाओं ने अलग-अलग समूह बनाकर सुबह-शाम निगरानी शुरू की है। शराब बेचने वालों और शराबियों को रोकने-टोकने की बात सामने आई है। महिलाओं के इस प्रयास से गांव में शराब कारोबारियों पर दबाव बनने का दावा भी किया जा रहा है।
लेकिन यही स्थिति प्रशासन के लिए सबसे बड़ा सवाल भी है।
अगर महिलाएं गांव में अवैध शराब के ठिकाने पहचान सकती हैं तो पुलिस और आबकारी विभाग क्यों नहीं?
अवैध शराब केवल किसी छोटे विक्रेता का मामला नहीं हो सकता। इसके पीछे सप्लाई, परिवहन और संरक्षण का नेटवर्क हो सकता है। इसलिए कार्रवाई केवल एक-दो लोगों को पकड़ने तक सीमित रही तो कारोबार फिर खड़ा हो जाएगा।
लाठी उठाना समाधान नहीं, सिस्टम की विफलता का संकेत है
महिलाओं का साहस निश्चित रूप से प्रशंसनीय है। लेकिन किसी गांव की महिलाओं को अपने स्तर पर लाठी लेकर शराब के खिलाफ गश्त करनी पड़े, यह कानून-व्यवस्था के लिए भी असहज करने वाली स्थिति है।
आज यह लाठी शराब के खिलाफ है। कल किसी शराब विक्रेता या ग्राहक से विवाद बढ़ गया तो यही संघर्ष टकराव का रूप ले सकता है।
इसलिए महिलाओं को कानून अपने हाथ में लेने की जरूरत नहीं पड़नी चाहिए।
कानून को अपना काम पहले करना होगा।
असली लड़ाई शराब से ज्यादा व्यवस्था की है
नर्मदापुरम जिले में अलग-अलग जगहों से उठ रही महिलाओं की आवाज को अलग-अलग घटनाओं की तरह देखने की बजाय इसे एक बड़े सामाजिक संकेत के रूप में देखने की जरूरत है।
सोमलवाड़ा की लाठी, पिसुआ का जुलूस, सारंगपुर का चक्काजाम और कलेक्ट्रेट की दहलीज तक पहुंची महिलाएं—ये सभी एक ही सवाल पूछ रही हैं।
घर बचाने की जिम्मेदारी सिर्फ महिलाओं की क्यों?
शराब रोकने की जिम्मेदारी सिर्फ शिकायतकर्ता की क्यों?
और कार्रवाई के लिए हर बार नई तारीख क्यों?
सरकार को राजस्व चाहिए, यह व्यवस्था का हिस्सा है। लेकिन राजस्व और सामाजिक नुकसान के बीच संतुलन बनाना भी सरकार की ही जिम्मेदारी है।
महिलाएं सड़क पर उतर चुकी हैं। अब देखना यह है कि व्यवस्था जागती है या अगली तारीख देकर आंदोलन को फिर टाल दिया जाता है।
हमारा निशाना
महिलाओं के हाथ में लाठी किसी व्यवस्था की सफलता की तस्वीर नहीं है। यह उस बिंदु की तस्वीर है जहां समाज ने व्यवस्था से पहले खुद पहरा देना शुरू कर दिया है।
शराब के खिलाफ महिलाओं की आवाज को सिर्फ प्रदर्शन मानकर खारिज करना आसान है। मुश्किल यह पूछना है कि वे सड़क पर आने को मजबूर क्यों हुईं?
(इमेज फोटो - दैनिक भास्कर से साभार )
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