इटारसी। शहर में सीवरेज के नाम पर बनाए जा रहे नाले अब सिर्फ पानी की निकासी का रास्ता नहीं रह गए हैं, बल्कि लोगों की जान के लिए खुला खतरा बनते जा रहे हैं। एमजीएम कॉलेज के पास खुले नाले में गिरने से रेलवे के पूर्व लोको पायलट सुनील मालवीय की मौत ने नगर पालिका और निर्माण एजेंसियों की सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
सवाल सीधा है—नाला बनाना जरूरी था या उसे सुरक्षित करना?
शुक्रवार रात न्यास कॉलोनी निवासी सुनील मालवीय एमजीएम कॉलेज के पास स्थित बड़े नाले में गिर गए। रात में नाले में पानी और गहराई के कारण उनका पता नहीं चल सका। शनिवार सुबह नाले में शव दिखाई देने पर पुलिस को सूचना दी गई। जेब से मिले आधार कार्ड और अन्य सामान से उनकी पहचान हुई। पुलिस की मौनालाजूदगी में शव बाहर निकाला गया।
खुला, मौत हुई... अब जिम्मेदारी किसकी?
शहर में खुले नालों को लेकर यह पहला सवाल नहीं है। पहले भी खुले नालों में गिरने और दुर्घटनाओं की घटनाएं सामने आती रही हैं। इसके बावजूद कई जगह नाले बिना ढक्कन, बिना मजबूत जाली और बिना पर्याप्त बैरिकेडिंग के खुले पड़े हैं।
रात में सड़क किनारे खुला नाला किसी के लिए दिखाई न देने वाला ‘मौत का मुहाना’ बन सकता है। एमजीएम कॉलेज के पास हुई घटना ने इसी खतरे को सामने ला दिया है।
पहले हादसे, फिर भी नहीं जागा सिस्टम
सूरजगंज मार्ग पर माहेश्वरी भवन के पास भी पूर्व में एक ग्रामीण युवक नाले में गिर गया था, जिससे उसकी मौत हो गई थी। महावीर स्कूल के पास भी स्कूटी सवार एनसीसी छात्राएं दुर्घटना के बाद नाले में जा गिरी थीं।
इन घटनाओं के बाद भी शहर के कई हिस्सों में खुले नाले मौजूद हैं।जैन स्तंभ के पास का लगभग दस फीट गहरा नाला भी जानलेवा तरीके से खुला हुआ है।
यानी हादसे होते रहे, सवाल उठते रहे और नाले अपनी जगह खुले ही रहे।
ठेकेदार की शर्तें भारी या सुरक्षा हल्की?
नालों के निर्माण को लेकर सबसे बड़ा सवाल टेंडर की शर्तों और मौके की हकीकत के बीच का है।
जहां लोगों की आवाजाही ज्यादा है, वहां नालों को ढंकना, मजबूत जाली लगाना या रेलिंग और बैरिकेडिंग करना जरूरी है। लेकिन कई स्थानों पर नाला सड़क के बिल्कुल किनारे खुला है।
अगर टेंडर में सुरक्षा का प्रावधान है तो जमीन पर क्यों नहीं दिख रहा?
और अगर प्रावधान ही नहीं है, तो ऐसी डिजाइन और व्यवस्था को मंजूरी किस आधार पर मिली?
कांग्रेस ने भी उठाए सवाल
जिला कांग्रेस कमेटी अध्यक्ष शिवाकांत पांडेय ने सुनील मालवीय की मौत पर चिंता जताते हुए शहर के खुले नालों को तत्काल सुरक्षित कराने की मांग की है।
उन्होंने एमजीएम कॉलेज के पास खुले नाले को ढंकने, आसपास बैरिकेडिंग लगाने और शहर के सभी खुले नालों का सर्वे कराने की मांग की। उनका कहना है कि स्कूल-कॉलेज, बाजार, आवासीय क्षेत्रों और मुख्य मार्गों के आसपास खुले नाले विशेष रूप से खतरनाक हैं।
पांडेय ने यह भी मांग की कि निर्माण कार्य में टेंडर की शर्तों का पालन कराया जाए और यदि कहीं शर्तों के विपरीत नाला खुला छोड़ा गया है तो जिम्मेदारों पर कार्रवाई होसड़क भी खुदी, नाला भी खुला—आम आदमी जाए तो जाए कहां?
शहर में समस्या सिर्फ खुले नालों तक सीमित नहीं है। कई इलाकों में निर्माण कार्यों के कारण सड़कें खुदी हैं और आसपास पर्याप्त सुरक्षा इंतजाम नहीं हैं।
एक तरफ सड़क पर खुदाई, दूसरी तरफ खुला नाला और ऊपर से रात का अंधेरा—ऐसे में हादसे को रोकने के लिए नागरिक से अतिरिक्त सावधानी की उम्मीद करना कितना उचित है?
निर्माण के नाम पर खतरा खड़ा करना विकास नहीं हो सकता।
अब सर्वे नहीं, कार्रवाई की जरूरत
सुनील मालवीय की मौत के बाद फिर से खुले नालों के सर्वे और सुरक्षा की मांग उठी है लेकिन शहर को अब सिर्फ सर्वे या आश्वासन नहीं, खुले नालों की सूची, जिम्मेदार एजेंसी और समयबद्ध सुरक्षा व्यवस्था चाहिए।
क्योंकि अगला हादसा होने के बाद फिर यही सवाल उठेगा—
नाला पहले से खुला था, खतरा पहले से दिख रहा था, फिर सुरक्षा पहले क्यों नहीं की गई?
नाले बने जानलेवा: ‘विकास’ के खुले गड्ढे में गई पूर्व लोको पायलट की जान, सुरक्षा इंतजामों पर बड़ा सवाल
हादसे होते रहे ,नाले खुले रहे ,कब जागेगा सिस्टम
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