मध्यप्रदेश में अवैध कॉलोनियों पर कार्रवाई के लिए नियमों में संशोधन दो साल से लंबित है। नर्मदापुरम में 44 अवै ध कॉलोनाइजरों की सूची 12 घंटे में गायब होने का मामला और स्थानीय निकायों के रिकॉर्ड कई सवाल खड़े करतेहैं।
नर्मदापुरम। शहरों में लोगों की जिंदगीभर की कमाई से खरीदे जाने वाले प्लॉट की वैधता का सवाल हो या अवैध कॉलोनियों में मूलभूत सुविधाओं के लिए भटकते रहवासियों की परेशानी—सरकार के पास फिलहाल इन समस्याओं का कोई ऐसा ठोस जवाब नजर नहीं आता, जो जमीन पर बदलाव की गारंटी दे सके। प्रदेश में अवैध कॉलोनियों पर शिकंजा कसने के लिए कानून में संशोधन की कवायद करीब दो साल से चल रही है, लेकिन नए नियम अब तक अंतिम रूप नहीं ले पाए हैं। इस बीच अवैध कॉलोनियों का विस्तार जारी रहने का अनुमान है और जिम्मेदार विभाग के पास उनकी अद्यतन संख्या तक उपलब्ध नहीं है।
प्रदेश की इस तस्वीर में नर्मदापुरम का एक पुराना घटनाक्रम भी कई सवाल खड़े करता है। करीब पांच महीने पहले दैनिक भास्कर की वेबसाइट पर प्रकाशित खबर के मुताबिक, तत्कालीन कलेक्टर सोमेश मिश्रा के निर्देश पर जिले के 44 अवैध कॉलोनाइजरों की सूची एसडीएम कार्यालय के नोटिस बोर्ड पर चस्पा की गई थी। लेकिन बताया गया कि महज 12 घंटे बाद ही यह सूची वहां से गायब हो गई।सूची क्यों हटाई गई, किसने हटाई और इसके बाद संबंधित कॉलोनाइजरों के खिलाफ क्या कार्रवाई हुई—इन सवालों का स्पष्ट जवाब सार्वजनिक होना जरूरी है। क्योंकि अवैध कॉलोनियों के खिलाफ कार्रवाई का मतलब केवल नामों की सूची जारी करना नहीं, बल्कि अवैध प्लॉटिंग पर रोक लगाना और जिम्मेदार लोगों के विरुद्ध नियमानुसार कार्रवाई सुनिश्चित करना भी है।
सूची चस्पा हुई, फिर गायब हो गई; कार्रवाई का हिसाब कौन देगा?
नर्मदापुरम जिले में अवैध कॉलोनियों का मुद्दा केवल जमीन की खरीद-बिक्री तक सीमित नहीं है। इसका सीधा संबंध उन लोगों की जमा-पूंजी से है, जो कम कीमत पर प्लॉट खरीदकर अपना घर बनाने का सपना देखते हैं। बाद में कॉलोनी की वैधता, विकास अनुमति, सड़क, नाली, पेयजल और अन्य सुविधाओं को लेकर परेशानी सामने आती है तो खरीदार खुद को मुश्किल में पाते हैं।ऐसे में 44 कथित अवैध कॉलोनाइजरों की सूची सामने आना महत्वपूर्ण कदम माना जा सकता था। लेकिन सूची के कुछ ही घंटों बाद गायब होने की खबर ने कार्रवाई की पारदर्शिता पर सवाल खड़े कर दिए। अब यह जानना जरूरी है कि सूची में शामिल लोगों के खिलाफ जांच कहां तक पहुंची और कितने मामलों में नियमानुसार कार्रवाई हुई।
निकायों के पास अपने क्षेत्र का हिसाब तक नहीं!
चिंता की बात यह है कि जिले के स्थानीय निकाय अपने-अपने क्षेत्र में अवैध कॉलोनियों की स्थिति को लेकर स्पष्ट जानकारी सार्वजनिक करने के लिए तैयार नहीं दिखते। यदि किसी नगर पालिका या नगर परिषद के पास अपने क्षेत्र की अवैध कॉलोनियों की अद्यतन सूची, जारी अनुमतियों का रिकॉर्ड और कार्रवाई का विवरण ही सहज रूप से उपलब्ध नहीं है, तो निगरानी की व्यवस्था पर सवाल उठना स्वाभाविक है।सवाल सीधे हैं—जिले में कितनी अवैध कॉलोनियां हैं? कितनी कॉलोनियों में प्लॉट बेचे जा चुके हैं? कितने मामलों में एफआईआर या अन्य कानूनी कार्रवाई हुई? कितनी कॉलोनियों को वैध करने की प्रक्रिया में लिया गया और कितने मामलों में अवैध निर्माण हटाने की कार्रवाई हुई?इन सवालों का जवाब किसी एक प्रेस नोट या सूची से नहीं, बल्कि निकायवार सार्वजनिक रिकॉर्ड से मिलना चाहिए।
प्रदेश में 7,981 का पुराना आंकड़ा, वास्तविक संख्या अब भी अस्पष्ट
प्रदेश स्तर पर भी स्थिति बहुत अलग नहीं है। उपलब्ध पुराने सर्वे में 7,981 अवैध कॉलोनियां चिह्नित की गई थीं। इसके बाद व्यापक सर्वे नहीं होने के कारण वर्तमान संख्या स्पष्ट नहीं है। ऐसे में यह आशंका जताई जा रही है कि कुल संख्या आठ हजार के पार पहुंच चुकी हो सकती है। हालांकि, नए सर्वे के अभाव में इसे पुष्ट आंकड़ा नहीं माना जा सकता।यानी जिस समस्या पर नियंत्रण के लिए सरकार सख्त कानून बनाने की तैयारी कर रही है, उसी समस्या का वर्तमान आकार भी स्पष्ट नहीं है। जब यह पता ही नहीं कि अवैध कॉलोनियां कहां-कहां और कितनी संख्या में विकसित हो चुकी हैं, तो कार्रवाई की प्राथमिकताएं तय करना भी चुनौतीपूर्ण होगा।
10 साल की जेल और पांच करोड़ जुर्माने का प्रस्ताव, लेकिन नियम अब भी अधूरे
अवैध कॉलोनाइजरों पर शिकंजा कसने के लिए प्रस्तावित संशोधनों में अधिकतम 10 साल की जेल और पांच करोड़ रुपये तक जुर्माने जैसे कड़े प्रावधान शामिल बताए गए हैं। इसके अलावा संबंधित अधिकारियों की जवाबदेही तय करने, संपत्तियों की वैधता जांचने के लिए ऑनलाइन रिकॉर्ड उपलब्ध कराने और अवैध कॉलोनियों के विरुद्ध कार्रवाई की प्रक्रिया स्पष्ट करने जैसे प्रस्ताव भी सामने आए हैं।प्रस्तावित प्रावधानों के मुताबिक, अवैध कॉलोनी हटाने के लिए 15 दिन का नोटिस देने और कार्रवाई नहीं होने पर संबंधित नगरीय निकाय को ध्वस्तीकरण कर जमीन अपने कब्जे में लेने का अधिकार देने की बात भी शामिल है।हालांकि, वरिष्ठ सचिव समिति की आपत्तियों और सुझावों के कारण नियमों का मसौदा फिर संशोधन की प्रक्रिया में उलझ गया है। नगरीय विकास एवं आवास विभाग को संशोधन के बाद प्रस्ताव दोबारा समिति के सामने रखना होगा। इसके बाद ही आगे की प्रक्रिया बढ़ सकेगी। जुलाई के विधानसभा सत्र में संशोधन विधेयक पेश किए जाने की बात भी पूरी नहीं हो सकी।
कॉलोनी सेल बना, अब नतीजों का इंतजार
नर्मदापुरम में अवैध कॉलोनियों पर कार्रवाई के लिए कॉलोनी सेल के गठन की जानकारी सामने आई है। लेकिन केवल सेल का गठन पर्याप्त नहीं होगा। उसकी कार्यप्रणाली, अब तक की कार्रवाई, चिह्नित कॉलोनियों की संख्या और लंबित मामलों का विवरण भी सार्वजनिक होना चाहिए।अवैध कॉलोनियों की समस्या का समाधान केवल नए कानून से भी नहीं होगा, जब तक जमीन की खरीद-बिक्री पर निगरानी, निर्माण अनुमतियों की जांच और जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही सुनिश्चित नहीं की जाती।
अब सवाल कानून का नहीं, जवाबदेही का भी है
सरकार के सामने चुनौती दोहरी है। एक ओर अवैध कॉलोनियों पर प्रभावी कार्रवाई के लिए संशोधित कानूनी प्रावधानों को अंतिम रूप देना है, दूसरी ओर मौजूदा व्यवस्था में उपलब्ध अधिकारों के तहत निगरानी और कार्रवाई की स्थिति स्पष्ट करनी है।नर्मदापुरम में 44 कॉलोनाइजरों की सूची सामने आने और फिर उसके गायब होने की खबर के बाद यह सवाल और अहम हो जाता है कि उस मामले में आगे क्या हुआ। क्या सूची में शामिल मामलों की जांच पूरी हुई? क्या किसी के विरुद्ध कार्रवाई हुई? क्या जिले के सभी नगरीय निकायों के पास अवैध कॉलोनियों का अद्यतन रिकॉर्ड है?
कानून का मसौदा फाइलों में कितना भी सख्त क्यों न हो, उसका असर तभी दिखेगा जब अवैध प्लॉटिंग रुकेगी, खरीदारों को समय रहते सही जानकारी मिलेगी और नियम तोड़ने वालों के साथ-साथ लापरवाही बरतने वालों की जवाबदेही भी तय होगी ।
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