भोपाल/नर्मदापुरम। चुनाव की आहट बड़ी कमाल की चीज होती है। जो सड़क पांच साल तक सिर्फ आम जनता को दिखाई देती है, वह चुनाव करीब आते ही माननीयों को भी दिखाई देने लगती है। जिस उद्योग की मांग वर्षों से फाइलों में धूल खा रही थी, अचानक उसकी जरूरत महसूस होने लगती है। और जिन सड़कों के मेंटेनेंस की याद बरसों से नहीं आई, उनके लिए अब अलग बजट की चिंता होने लगी है।
सियासी गलियारों में इसे कोई सक्रियता कह रहा है, कोई चुनावी तैयारी। जनता इसे क्या कह रही है, यह अभी खुलकर सामने नहीं आया है... लेकिन उसकी खामोशी का मतलब समझने वाले समझ रहे हैं।
इटारसी का सवाल सिर्फ सड़क का नहीं
इटारसी की पहचान रेलवे जंक्शन की है। आवाजाही है, व्यापार है, आसपास बड़ा कृषि क्षेत्र है। बावजूद इसके स्थानीय युवाओं के लिए बड़े रोजगार के अवसर अब भी सवाल बने हुए हैं।
शहर में यातायात की समस्या हो या बाहरी इलाकों की कनेक्टिविटी—हर चुनाव में मुद्दे लगभग वही रहते हैं।
अब सवाल यह है कि इतने वर्षों में इन समस्याओं का स्थायी इलाज क्यों नहीं निकला?
हर चुनाव में नई घोषणा और हर बारिश में पुरानी समस्या—यह गणित अब जनता भी समझने लगी है।
नर्मदापुरम में विकास की तस्वीर और राजनीति का फ्रेम
नर्मदापुरम संभाग मुख्यालय है। पर्यटन, कृषि, शिक्षा और प्रशासनिक गतिविधियों की अपनी संभावनाएं हैं। मगर संभाग की राजनीति में विकास का सवाल अक्सर स्थानीय खेमेबाजी के शोर में दब जाता है।
किसका खेमा मजबूत है, किसके समर्थक ज्यादा हैं, किसकी फोटो किस कार्यक्रम में बड़ी है—इन चर्चाओं के बीच जनता का सवाल धीरे से आता है—
“हमारे हिस्से में आया क्या?”
शायद यही वजह है कि अब कई माननीय सरकार के सामने बड़े अधोसंरचनात्मक प्रोजेक्ट की मांग रख रहे हैं।
पिपरिया में भी सड़क से आगे की बात
पिपरिया की राजनीति में सड़क, कृषि और स्थानीय व्यापार हमेशा महत्वपूर्ण मुद्दे रहे हैं। लेकिन अब चर्चा सिर्फ सड़क तक सीमित नहीं है।किसानों को बेहतर बाजार चाहिए, युवाओं को रोजगार चाहिए और व्यापारियों को बेहतर कनेक्टिविटी।अर्थात मतदाता का एजेंडा बड़ा हो रहा है।अब सिर्फ सड़क बनवाने से बात नहीं बनेगी, सड़क के दोनों तरफ अर्थव्यवस्था भी चाहिए।
सोहागपुर-सिवनी मालवा का सवाल भी वही
ग्रामीण और कृषि क्षेत्रों में सिंचाई, सड़क, मंडी, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी जरूरतें लंबे समय से चुनावी मुद्दे रही हैं।लेकिन इस बार शायद फर्क यह है कि जनता इन्हें अलग-अलग समस्याओं की तरह नहीं, एक-दूसरे से जुड़े विकास के हिस्से के रूप में देखने लगी है।
अच्छी सड़क होगी तो बाजार तक पहुंच आसान होगी। सिंचाई होगी तो उत्पादन बढ़ेगा। उत्पादन बढ़ेगा तो बाजार और परिवहन की जरूरत बढ़ेगी। उद्योग आएगा तो रोजगार बढ़ेगा।यानी अब जनता को 'एक काम' नहीं, विकास की पूरी चेन चाहिए।
और इधर कुछ माननीय अभी भी पोस्टिंग में व्यस्त हैं...
सियासत में हर नेता की अपनी प्राथमिकता होती है।
कोई चार-लेन सड़क के पीछे लगा है। कोई औद्योगिक क्षेत्र के लिए पत्र लिख रहा है। कोई पुराने कामों के मेंटेनेंस का बजट मांग रहा है।और कुछ ऐसे भी हैं जिनकी राजनीति अभी भी ट्रांसफर-पोस्टिंग और शिकायतों की फाइलों से बाहर नहीं निकल पाई है।यहां किसी का नाम लेने की जरूरत नहीं।
जिसे अपनी राजनीति का आईना देखना हो, वह अपने क्षेत्र की पांच साल पुरानी विकास सूची देख ले।
भूमिपूजन का बोर्ड बनाम जनता की याददाश्त
हमारे यहां भूमिपूजन की राजनीति का अपना इतिहास रहा है। पत्थर लगते हैं, फोटो खिंचती है, खबर छपती है और कुछ समय बाद उसी जगह घास उग आती है।लेकिन अब मोबाइल कैमरा जनता के हाथ में है।
वह भूमिपूजन की तस्वीर भी रखती है और अधूरे काम की तस्वीर भी।
इसलिए आने वाले दिनों में सिर्फ यह बताना मुश्किल होगा कि कितने काम शुरू हुए।
जनता पूछ सकती है—कितने पूरे हुए?  कितने टिके? और कितनों का फायदा वास्तव में कितने लोगों को मिला?
विधानसभा में कौन बोलता है, कौन सिर्फ सिर हिलाता है?
विधानसभा की कार्यवाही के सीधे प्रसारण की मांग लंबे समय से उठती रही है। यह शुरू हुआ तो सियासत के कई चेहरे और कई खामोशियां जनता के सामने आ सकती हैं।फिर पता चलेगा कि क्षेत्र की समस्या लेकर सदन में कौन खड़ा होता है और कौन सिर्फ सरकार के साथ खड़े रहने की अपनी भूमिका निभाता है।
कैमरा बहुत निष्पक्ष होता है साहब... उसे न खेमा दिखता है, न गुट।
उसे सिर्फ रिकॉर्ड दिखता है।
बहिष्कार का डर आखिर क्यों?
चुनाव में बहिष्कार की चेतावनियां नई नहीं हैं। लेकिन इनके पीछे छिपा संदेश राजनीतिक दलों के लिए महत्वपूर्ण है।मतदाता अब सिर्फ यह नहीं कहता कि सड़क खराब है।वह पूछता है—सड़क ठीक कराने की जिम्मेदारी किसकी थी? वह सिर्फ रोजगार की कमी नहीं बताता।वह पूछता है—पांच साल में रोजगार के लिए क्या किया गया?यही सवाल जनप्रतिनिधियों की असली परीक्षा है।
सियासी गलियारे में चर्चा कुछ और है...
कहा जा रहा है कि चुनावी साल में प्रदेश के कई क्षेत्रों से बड़ी-बड़ी मांगें तेजी से ऊपर पहुंच रही हैं।
चार-लेन सड़कें, औद्योगिक क्षेत्र, पुल, सिंचाई परियोजनाएं, पुराने निर्माणों का मेंटेनेंस...
सब जरूरी हैं।लेकिन गलियारे में धीमी आवाज में एक सवाल भी चल रहा है—
“अगर ये काम इतने जरूरी थे तो चुनाव के साल का इंतजार क्यों?”
नाम किसी का नहीं लिया जा रहा।जरूरत भी नहीं है।
इटारसी वाले अपने इलाके को जानते हैं, नर्मदापुरम वाले अपनी राजनीति को, पिपरिया-सोहागपुर वाले अपने माननीयों को और सिवनी-मालवा वाले अपने सवालों को।आखिर जनता भी अब समझदार है...
चबूतरा दिखाइए—वह पूछेगी सड़क कहां है।
सड़क दिखाइए—वह पूछेगी रोजगार कहां है।
उद्योग का बोर्ड लगाइए—वह पूछेगी उद्योग चला भी या नहीं।और विकास की बड़ी तस्वीर दिखाइए—वह शायद सबसे पहले पूछेगी—
“इसमें हमारा हिस्सा कितना है?”
यही बदलता हुआ सवाल आने वाले चुनाव की असली कहानी लिख सकता है।
सियासी गलियारों में अभी फाइलें दौड़ रही हैं...
जनता की नजरें भी।
और दोनों की मंजिल एक ही है—चुनाव।