इटारसी। उम्र छोटी है, भावनाएं तेज हैं और फैसलों की दुनिया अभी पूरी तरह समझ में नहीं आई है। किशोरावस्था में पैदा होने वाला आकर्षण जब परिवार से संवाद की कमी, पारिवारिक विरोध या भावनात्मक तनाव से टकराता है, तो कई बार नाबालिग बालिकाएं घर छोड़ने जैसा जोखिम भरा कदम उठा लेती हैं। रेलवे जंक्शन होने के कारण इटारसी ऐसे मामलों में कई बार उन बालिकाओं का पड़ाव बन जाता है, जो अपने घर से निकलकर किसी अनजान मंजिल की ओर जा रही होती हैं।
इन बालिकाओं के लिए मुस्कान बालिका गृह फिलहाल सुरक्षा और पुनर्वास का महत्वपूर्ण केंद्र बना हुआ है। पिछले दो माह में यहां 17 बालिकाओं को संरक्षण दिया गया। इनमें नौ बालिकाएं रेलवे स्टेशन या आसपास मिलीं, जबकि आठ बालिकाएं अन्य जिलों की बाल कल्याण समितियों के आदेश पर संस्था पहुंचीं।
मुंबई से निकली किशोरी इटारसी में मिली सुरक्षित
हाल ही में प्रेम-प्रसंग के चलते मुंबई से घर छोड़कर निकली एक नाबालिग किशोरी इटारसी रेलवे स्टेशन पर सुरक्षित मिली। आरपीएफ ने उसे ट्रेन से उतारकर आवश्यक प्रक्रिया के बाद मुस्कान बालिका गृह पहुंचाया।
इसके बाद बाल कल्याण समिति के माध्यम से सामाजिक अन्वेषण रिपोर्ट (एसआईआर), परिवार की पहचान, पारिवारिक सत्यापन और काउंसलिंग की प्रक्रिया पूरी की गई। मंगलवार को किशोरी को उसके परिजनों के सुपुर्द कर दिया गया। नाबालिग की पहचान उसकी सुरक्षा के मद्देनजर गोपनीय रखी गई है।
दो माह में 17 बालिकाएं, नौ परिवारों तक लौटीं 
संस्था के अनुसार पिछले दो माह में संरक्षण में आई 17 बालिकाओं में से नौ को आवश्यक जांच और प्रक्रिया पूरी होने के बाद उनके परिवारों को सौंप दिया गया। शेष आठ बालिकाएं अन्य जिलों की बाल कल्याण समितियों के निर्देश पर संस्था में रह रही हैं।
मुस्कान बालिका गृह में नर्मदापुरम के साथ हरदा, विदिशा, रायसेन और सीहोर सहित पांच जिलों की बालिकाओं की जिम्मेदारी आती है। इनमें बड़ी संख्या 15 से 16 वर्ष की किशोरियों की है।
इन मामलों के पीछे प्रेम-प्रसंग के अलावा पारिवारिक विवाद, भावनात्मक तनाव, घर से पलायन और संरक्षण की जरूरत जैसे कारण सामने आते हैं।
परिवार तक पहुंचने में कानून की प्रक्रिया जरूरी
दूसरे जिले या राज्य से मिली बालिका को केवल पहचान बताने के आधार पर तत्काल परिवार को नहीं सौंपा जा सकता। उसकी पहचान, बताए गए पते, परिवार के वातावरण और सुरक्षा का सत्यापन करना पड़ता है। एसआईआर और बाल कल्याण समिति की प्रक्रिया भी पूरी करनी होती है।
दूसरे राज्यों या जिलों से जानकारी और रिपोर्ट मिलने में देरी होने पर बालिकाओं की बेचैनी बढ़ती है। लंबे समय तक संस्था में रहने के दौरान कुछ बालिकाएं बाहर निकलने या समूह बनाकर भागने का प्रयास भी कर सकती हैं।
इसका असर केवल सुरक्षा व्यवस्था पर ही नहीं, बल्कि संस्था में रह रही दूसरी बालिकाओं की पढ़ाई, काउंसलिंग और पुनर्वास प्रक्रिया पर भी पड़ता है।

चाइल्डलाइन बंद, तो रेलवे जंक्शन पर चुनौती और बड़ी
इटारसी जैसे बड़े रेलवे जंक्शन पर बाल संरक्षण व्यवस्था के सामने एक दूसरी बड़ी चुनौती भी है। जिले में चाइल्डलाइन और रेलवे चाइल्डलाइन की नियमित सेवाएं करीब तीन वर्षों से बंद हैं।
पहले किसी संस्था से बच्चा या किशोर-किशोरी लापता होता था तो उसकी फोटो, हुलिया और जरूरी जानकारी रेलवे स्टेशनों पर सक्रिय चाइल्डलाइन टीमों तक पहुंचाई जाती थी। प्रशिक्षित टीमें ट्रेनों और प्लेटफॉर्म पर तलाश कर बच्चों को सुरक्षित संरक्षण में लेने का काम करती थीं।
अब समर्पित रेलवे चाइल्डलाइन टीम नहीं होने से एक ट्रेन से दूसरी ट्रेन बदलकर बच्चा कई जिलों या राज्यों तक पहुंच सकता है। तलाश में देरी होने पर उसके शोषण, मानव तस्करी या अन्य असुरक्षित परिस्थितियों में फंसने का खतरा बढ़ सकता है।
इटारसी जैसे महत्वपूर्ण रेलवे जंक्शन पर 24 घंटे सक्रिय और प्रशिक्षित बाल सहायता एवं बचाव इकाई की जरूरत महसूस की जा रही है।
प्रेम-प्रसंग के मामलों में सबसे बड़ी जरूरत—डांट नहीं, संवाद
अधिवक्ता अंशिका सिंह के अनुसार 15-16 वर्ष की उम्र में मानसिक, भावनात्मक और हार्मोनल बदलाव तेजी से होते हैं। इस उम्र में आकर्षण स्वाभाविक हो सकता है, लेकिन जीवन के बड़े फैसले लेने की परिपक्वता अभी पूरी तरह विकसित नहीं होती।
उनका कहना है कि माता-पिता को केवल डांटने या रोकने के बजाय बच्चों से खुलकर बातचीत करनी चाहिए। उनकी भावनाओं को समझना चाहिए और जरूरत पड़ने पर मनोवैज्ञानिक परामर्श लेना चाहिए।
गर्भवती नाबालिग और नवजात की देखभाल भी बड़ी चुनौती
बाल संरक्षण के कुछ मामले सामान्य परिस्थितियों से कहीं ज्यादा जटिल होते हैं। संस्था में गर्भवती नाबालिग बालिकाओं और उनके नवजात बच्चों की देखभाल भी करनी पड़ रही है।
मुस्कान बालिका गृह में अब तक दो नाबालिग बालिकाओं का सुरक्षित प्रसव कराया गया है। दोनों अपने नवजात बच्चों के साथ संस्था में रह रही हैं।
नियमित स्वास्थ्य जांच, टीकाकरण, पौष्टिक आहार, दवाइयां, कपड़े और चौबीस घंटे देखभाल जैसी जिम्मेदारियां संस्था निभा रही है। वहीं पिता के नाम, डीएनए जांच, पुलिस विवेचना और न्यायालयीन प्रक्रिया जैसे मामलों के कारण नवजातों के जन्म प्रमाणपत्र, आधार और अन्य सरकारी दस्तावेज बनवाने में भी कठिनाइयां सामने आती हैं।
ऐसे मामलों के लिए सामान्य बालिका गृह से अलग विशेष कक्ष, प्रशिक्षित आया, चिकित्सकीय निगरानी और शिशु विशेषज्ञों की व्यवस्था जरूरी है।

दस्तावेज नहीं तो पढ़ाई भी अटक जाती है
घर से दूर होकर संरक्षण गृह पहुंचने वाली कई बालिकाओं के पास आधार कार्ड, समग्र आईडी, अंकसूची, टीसी अथवा स्कूल से संबंधित दूसरे दस्तावेज नहीं होते।
नतीजा यह कि नई जगह स्कूल में प्रवेश, छात्रवृत्ति और नियमित पढ़ाई शुरू कराने में परेशानी आती है। कई मामलों में दस्तावेज जुटाने में इतना समय लग जाता है कि पूरा शैक्षणिक सत्र प्रभावित होने का खतरा रहता है।
जरूरत है कि संबंधित जिला प्रशासन, परिवार, स्कूल और विभागों के बीच समन्वय से बालिका के दस्तावेज निश्चित समय-सीमा में उपलब्ध कराने की व्यवस्था बने।
‘सेवा संकल्प’ से शुरू हुआ था काम, अब बढ़ रहा जिम्मेदारियों का दायरा
मुस्कान बालिका गृह के संचालक मनीष ठाकुर बताते हैं कि संस्था की शुरुआत जरूरतमंद बच्चों की शिक्षा, सुरक्षा और बेहतर भविष्य के सेवा संकल्प के साथ हुई थी।
उनके अनुसार पहले मुख्य रूप से ऐसे बच्चों की जरूरतें सामने आती थीं, जिनके माता-पिता नहीं हैं या परिवार उनकी शिक्षा और देखभाल करने में सक्षम नहीं है। अब ऐसे मामलों की संख्या बढ़ रही है, जिनमें माता-पिता मौजूद हैं, लेकिन किशोरियां पारिवारिक असहमति या कम उम्र के प्रेम-प्रसंग के कारण परिवार और संस्था—दोनों जगह रहने के लिए तैयार नहीं होतीं।
उनका कहना है कि पांच जिलों की बालिकाओं की जिम्मेदारी, पलायन के मामले, गर्भवती बालिकाओं और नवजातों की देखभाल, कर्मचारियों की कमी, सुरक्षा जोखिम, अनुदान में देरी और बढ़ती कानूनी जवाबदेही से संस्था के संसाधनों पर लगातार दबाव बढ़ रहा है। इसलिए मुस्कान बालिका गृह की संचालन समिति संचालन जारी रखने या बंद करने पर पुनर्विचार कर रही है।

सिर्फ बालिका की काउंसलिंग से नहीं निकलेगा रास्ता
बाल संरक्षण गृह किसी संकटग्रस्त बालिका को सुरक्षित वातावरण, भोजन, आवास, शिक्षा, चिकित्सा और काउंसलिंग दे सकते हैं, लेकिन वे परिवार का स्थायी विकल्प नहीं हैं।
यही वजह है कि ऐसे मामलों में काउंसलिंग केवल बालिका की नहीं, परिवार की भी होनी चाहिए।
जहां परिवार का वातावरण सुरक्षित है, वहां सत्यापन, परामर्श और आवश्यक निगरानी के साथ बालिका को परिवार में वापस जोड़ना प्राथमिकता होनी चाहिए। वहीं प्रत्येक मामले के लिए उसकी मानसिक स्थिति, सुरक्षा, शिक्षा, पारिवारिक परिस्थितियों और भविष्य को ध्यान में रखते हुए अलग पुनर्वास योजना जरूरी है।
सिस्टम को जोड़ना होगा, तभी सुरक्षित होगा बचपन
बालिका की सुरक्षित वापसी केवल एक संस्था की जिम्मेदारी नहीं हो सकती। बाल कल्याण समिति, पुलिस, आरपीएफ, जीआरपी, विशेष किशोर पुलिस इकाई, महिला एवं बाल विकास, स्वास्थ्य और शिक्षा विभाग, संरक्षण गृह तथा मनोवैज्ञानिक परामर्शदाताओं के बीच तेज और समयबद्ध समन्वय जरूरी है।
क्योंकि सवाल सिर्फ यह नहीं है कि घर से निकली बच्ची को वापस घर कैसे पहुंचाया जाए। असली सवाल यह है कि वह घर छोड़ने के लिए मजबूर क्यों हुई—और वापस लौटने के बाद दोबारा वही स्थिति पैदा न हो, इसके लिए परिवार और व्यवस्था क्या बदलने को तैयार है।
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हमारा निशाना | मुद्दे की असली बात
किशोरावस्था को सिर्फ अनुशासन से नहीं, समझ से संभालना होगा।
15-16 साल की उम्र में पैदा होने वाला आकर्षण अपने आप में अपराध नहीं, लेकिन इसी उम्र में लिया गया जल्दबाजी का फैसला जिंदगी को जोखिम में डाल सकता है। इसलिए जरूरत बच्चों पर पहरा बढ़ाने से ज्यादा माता-पिता और बच्चों के बीच संवाद बढ़ाने की है।
बच्ची को घर वापस लाना समाधान का अंत नहीं, शुरुआत है।