2029 के चुनाव के लिए कांग्रेस ने एक 'डुअल लीडरशिप मॉडल' तैयार किया है। इस योजना के तहत राहुल गांधी जनता के बीच रहकर पार्टी का मुख्य चेहरा बनेंगे और युवाओं व छात्रों से जुड़ने के लिए 'छात्रों की गूंज' जैसे अभियानों का नेतृत्व करेंगे। वहीं, प्रियंका गांधी वाड्रा पर्दे के पीछे रहकर रणनीति संभालेंगी, जिसमें वह पार्टी की छवि सुधारने, नैरेटिव तय करने और चुनावी रणनीति को जमीन पर लागू करने का काम करेंगी।

नई दिल्ली। 2029 का लोकसभा चुनाव अभी दूर है, लेकिन कांग्रेस ने उसकी जमीन तैयार करने की कवायद तेज कर दी है। पार्टी के भीतर चल रही बैठकों और संगठनात्मक मंथन से संकेत है कि इस बार फोकस सिर्फ गठबंधन के गणित पर नहीं, बल्कि अपने संगठन की ताकत बढ़ाने पर है।
राहुल गांधी, प्रियंका गांधी वाड्रा और संगठन महासचिव केसी वेणुगोपाल के बीच हुई बैठकों के बाद संगठन में बड़े बदलाव की तैयारी है। एआईसीसी के 65 से ज्यादा सचिव पदों के लिए स्क्रीनिंग चल रही है। खास बात यह है कि नए चेहरों में जमीनी सक्रियता के साथ युवाओं और Gen Z तक पहुंच बनाने की क्षमता भी देखी जा रही है।
राहुल सड़क पर, प्रियंका रणनीति के मोर्चे पर?
कांग्रेस के प्रस्तावित मॉडल में राहुल गांधी की भूमिका पार्टी के प्रमुख सार्वजनिक चेहरे की रहेगी। छात्र, युवा और आम मतदाताओं के बीच सीधा संवाद बढ़ाने पर जोर रहेगा। ‘छात्रों की गूंज’ जैसे अभियानों को इसी व्यापक रणनीति से जोड़कर देखा जा रहा है।
दूसरी तरफ प्रियंका गांधी वाड्रा को चुनावी रणनीति और मैनेजमेंट की बड़ी जिम्मेदारी देने की तैयारी की चर्चा है। प्रस्तावित इलेक्शन मैनेजमेंट स्ट्रैटेजी ग्रुप में अनुभवी नेताओं के साथ युवा चेहरों को शामिल करने की योजना बताई जा रही है।
यानी संदेश साफ है—एक चेहरा मैदान में, दूसरा संगठन की रणनीति के मोर्चे पर।
65 सचिवों की स्क्रीनिंग में क्या तलाश रही कांग्रेस?
संगठन के कमजोर हिस्सों को मजबूत करने के लिए राज्यों में नए सचिवों की नियुक्ति को अहम माना जा रहा है। उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, ओडिशा और महाराष्ट्र जैसे बड़े राज्यों पर विशेष ध्यान है।
यहां सिर्फ राजनीतिक अनुभव ही पैमाना नहीं बताया जा रहा। जमीनी पकड़, संगठन खड़ा करने की क्षमता और युवाओं से संवाद—इन पहलुओं को भी स्क्रीनिंग में महत्व दिया जा रहा है।
असली परीक्षा गठबंधन नहीं, अपना संगठन
कांग्रेस की रणनीति में सबसे महत्वपूर्ण बदलाव सहयोगी दलों के साथ तालमेल से आगे बढ़कर अपने संगठन को चुनावी लड़ाई के लिए तैयार करना दिखाई देता है।
विपक्षी गठबंधन चुनावी राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता रहा है, लेकिन कांग्रेस के भीतर यह विचार मजबूत हुआ है कि बड़े राज्यों में अपनी सांगठनिक ताकत कमजोर रही तो गठबंधन का गणित भी सीमित असर डाल सकता है।
इसलिए 2029 की तैयारी का पहला सवाल सीटों का बंटवारा नहीं, बल्कि बूथ से लेकर एआईसीसी तक संगठन को कितना सक्रिय किया जा सकता है, यह बनता दिख रहा है।
राहुल-प्रियंका की जोड़ी के सामने असली चुनौती
राहुल गांधी के लिए चुनौती देशभर में पार्टी की राजनीतिक पहुंच को लगातार बनाए रखना होगी। प्रियंका गांधी के सामने संगठन, संदेश और चुनावी प्रबंधन को एक साथ जोड़ने की जिम्मेदारी होगी।
लेकिन इस पूरी कवायद का असर तभी दिखेगा, जब दिल्ली की रणनीति राज्यों और जिलों की जमीन तक पहुंचे। बैठकों से संगठन बन सकता है, लेकिन चुनावी ताकत बूथ पर ही दिखाई देती है।
2029 की लड़ाई में कांग्रेस का यह नया प्रयोग कितना असरदार साबित होता है, इसका जवाब अभी भविष्य के गर्भ में है। फिलहाल पार्टी ने संकेत जरूर दे दिया है कि अगली बड़ी चुनावी लड़ाई के लिए तैयारी अभी से शुरू है।
क्विक आंसर्स
2029 के लिए कांग्रेस का राहुल-प्रियंका मॉडल क्या है?
प्रस्तावित रणनीति में राहुल गांधी को पार्टी के प्रमुख सार्वजनिक चेहरे और प्रियंका गांधी वाड्रा को रणनीति व चुनावी प्रबंधन की महत्वपूर्ण भूमिका से जोड़ा जा रहा है।
कांग्रेस 65 से ज्यादा सचिव क्यों नियुक्त कर रही है?
संगठन के कमजोर हिस्सों को मजबूत करने और राज्यों में जमीनी नेटवर्क को सक्रिय करने के लिए नए सचिवों की स्क्रीनिंग की जा रही है।
किन राज्यों पर फोकस है?
उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, ओडिशा और महाराष्ट्र जैसे बड़े राज्यों को संगठनात्मक विस्तार के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
क्या कांग्रेस सहयोगियों से दूरी बना रही है?
ऐसा कहना जल्दबाजी होगी। उपलब्ध रणनीतिक संकेतों से इतना स्पष्ट है कि पार्टी गठबंधन राजनीति के साथ-साथ अपने संगठन को स्वतंत्र रूप से मजबूत करने पर जोर दे रही है।