भोपाल / मध्यप्रदेश भाजपा में अब संगठन की “रीसेट बटन” दबाने की तैयारी है। नए प्रदेश प्रभारी बिप्लब कुमार देब, सह प्रभारी और संगठन महामंत्री की नई टीम के बाद पार्टी ने संगठन की अंदरूनी तस्वीर खंगालनी शुरू कर दी है। संकेत साफ हैं—जो संगठन चलाएगा, वही रहेगा; जो सिर्फ पद संभाले बैठा है, उसकी कुर्सी पर सवाल उठेगा।
प्रदेश कोर कमेटी से लेकर जिला स्तर की कोर कमेटियों तक फेरबदल की तैयारी है। सबसे ज्यादा नजर जिलों पर है, जहां निकाय चुनाव से पहले गुटबाजी, निष्क्रियता और आपसी खींचतान को खत्म करने के लिए करीब डेढ़ दर्जन जिलाध्यक्षों को बदले जाने की चर्चा है।
हालांकि अंतिम फैसला प्रदेश नेतृत्व की समीक्षा के बाद होगा, लेकिन संगठन में बदलाव की आहट ने कई जिलों में राजनीतिक गणित जरूर बदल दिया है।
अब पद नहीं, प्रदर्शन का हिसाब होगा
भाजपा के नए संगठनात्मक फॉर्मूले में सिर्फ यह नहीं देखा जाएगा कि कौन किस खेमे के करीब है। सवाल यह भी होगा कि कौन जमीन पर है और कौन सिर्फ संगठन की बैठकों में दिखाई देता है।
प्रदेश नेतृत्व बूथ स्तर से फीडबैक जुटाने की तैयारी में है। यानी जिलाध्यक्ष से लेकर स्थानीय पदाधिकारी तक की सक्रियता का हिसाब अब ऊपर बैठे नेताओं की रिपोर्ट से नहीं, बल्कि नीचे के कार्यकर्ताओं और बूथ की स्थिति से लिया जाएगा।
यही व्यवस्था कई नेताओं के लिए सबसे बड़ी चिंता बन सकती है।
क्योंकि बैठक में सक्रिय दिखना आसान है, बूथ पर सक्रिय होना नहीं।

कोर कमेटी भी बदलेगी, समीकरण भी
प्रदेश कोर कमेटी के कुछ मौजूदा सदस्यों को हटाकर संगठन में सक्रिय नेताओं को जगह दिए जाने की संभावना है। जिला स्तर पर बदलाव और व्यापक हो सकता है।
निकाय चुनाव को देखते हुए वरिष्ठ नेताओं, पूर्व विधायकों और पूर्व सांसदों को जिला कोर कमेटियों में शामिल करने की तैयारी है। मकसद चुनावी प्रबंधन में अनुभव का इस्तेमाल करना और अलग-अलग गुटों के बीच समन्वय कायम करना बताया जा रहा है।
लेकिन इसके साथ एक राजनीतिक सवाल भी खड़ा है—क्या पुराने चेहरे गुटबाजी खत्म करेंगे या पुराने समीकरण फिर सक्रिय होंगे?
यही प्रयोग संगठन के लिए असली परीक्षा होगा।

दतिया बना मॉडल या चेतावनी?
दतिया में विधानसभा उपचुनाव में भाजपा के प्रदर्शन के बाद जिला संगठन भंग किया गया था। सितंबर में माघवेंद्र सिंह परिहार को नया जिलाध्यक्ष बनाया गया। अब नई जिला टीम के गठन की प्रक्रिया आगे बढ़ रही है।
दतिया में की गई कार्रवाई को पार्टी के भीतर संगठनात्मक प्रदर्शन और गुटबाजी की समीक्षा से जोड़कर देखा जा रहा है। अब दूसरे जिलों के पदाधिकारियों की निगाह भी इसी मॉडल पर है।
दतिया में संगठन बदला, अब सवाल है अगला नंबर किस जिले का?

डेढ़ दर्जन जिलों में बदल सकता है चेहरा
पार्टी सूत्रों के मुताबिक करीब डेढ़ दर्जन जिलाध्यक्षों को बदला जा सकता है। हालांकि इस संख्या पर अंतिम मुहर अभी नहीं लगी है।
दरअसल निकाय चुनाव से पहले भाजपा किसी भी जिले में ऐसा संगठन नहीं चाहती, जहां पदाधिकारी आपस में ही उलझे हों और चुनाव के समय कार्यकर्ता अलग-अलग खेमों में बंट जाएं।
प्रदेश प्रभारी बिप्लब कुमार देब के दौरे में भी नेताओं को तीन महीने के भीतर मतभेद और गुटबाजी खत्म करने का संदेश दिया गया था। अब संगठनात्मक बदलाव को उसी संदेश की अगली कड़ी माना जा रहा है।

युवा वोटर भी बनेगा संगठन की परीक्षा का पैमाना
भाजपा आगामी चुनावों में युवा मतदाताओं को लेकर भी बूथ स्तर से फीडबैक जुटाएगी।
पार्टी यह जानना चाहती है कि सरकार की योजनाओं और संगठन की गतिविधियों की युवाओं तक कितनी पहुंच है। किन बूथों पर संगठन मजबूत है, कहां कार्यकर्ता निष्क्रिय हैं और किन इलाकों में नए चेहरों को जिम्मेदारी देने की जरूरत है—इन सभी बिंदुओं पर रिपोर्ट तैयार की जाएगी।
इसका मतलब साफ है—अब संगठन की रिपोर्ट सिर्फ जिलाध्यक्ष नहीं बनाएगा, बूथ भी जिलाध्यक्ष की रिपोर्ट बनाएगा।

निकाय चुनाव से पहले भाजपा की असली परीक्षा
अगले साल प्रस्तावित नगरीय निकाय चुनाव भाजपा के लिए सिर्फ चुनाव नहीं, संगठन की नई व्यवस्था की पहली बड़ी परीक्षा होंगे। इसके बाद विधानसभा चुनाव की तैयारी भी शुरू होनी है।
इसलिए अभी होने वाला फेरबदल आने वाले चुनावों की रणनीति का आधार बन सकता है।
भाजपा के सामने चुनौती दोहरी है—एक तरफ विपक्ष से मुकाबला और दूसरी तरफ अपने ही संगठन में गुटबाजी पर लगाम।
प्रदेश नेतृत्व ने यदि सक्रिय कार्यकर्ताओं को आगे बढ़ाया, निष्क्रिय पदाधिकारियों को हटाया और गुटों के बजाय संगठन को प्राथमिकता दी तो बदलाव असरदार हो सकता है। लेकिन यदि फेरबदल सिर्फ एक गुट को दूसरे गुट से बदलने तक सीमित रहा, तो समस्या चेहरे बदलने के बाद भी वहीं रहेगी।

अब कुर्सी नहीं, बूथ बोलेगा
मध्यप्रदेश भाजपा में आने वाले दिनों में सबसे ज्यादा चर्चा चुनावी टिकट की नहीं, संगठन की कुर्सियों की हो सकती है।
कौन रहेगा, कौन जाएगा और किसे नई जिम्मेदारी मिलेगी—इसका फैसला सिर्फ राजधानी की बैठकों में नहीं, बूथ से मिलने वाले फीडबैक से तय करने की कोशिश होगी।
और यही नए संगठन की सबसे बड़ी परीक्षा भी होगी।
क्योंकि चुनाव में पोस्टर चेहरा जिताता है, लेकिन बूथ कार्यकर्ता चुनाव जिताता है।