भोपाल। मध्यप्रदेश में पिछले करीब छह महीने से अलग-अलग कर्मचारी संगठनों के लगातार आंदोलनों ने सरकार की चिंता बढ़ा दी है। शिक्षक, संविदा कर्मचारी, आउटसोर्स कर्मचारी, स्वास्थ्यकर्मी, लघु वेतन कर्मचारी और चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों के आंदोलन के बाद अब सरकार इस पूरे सिलसिले को रोकने के लिए नई रणनीति तैयार करने की तैयारी में है।
सरकार का फोकस अब केवल आंदोलन खत्म कराने पर नहीं, बल्कि कर्मचारियों की नाराजगी सड़क पर आने से पहले उसे दूर करने पर रहेगा। इसके लिए कर्मचारी संगठनों के साथ मंथन के साथ ही विभागवार कर्मचारियों से सीधे संवाद की व्यवस्था पर भी विचार किया जा रहा है।
सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती—मांगें नहीं, लगातार बन रही आंदोलन की तस्वीर
सरकार की ओर से भर्ती प्रक्रिया तेज करने, युवाओं को रोजगार देने और कर्मचारियों से जुड़ी कुछ मांगों पर निर्णय लेने के बावजूद अलग-अलग वर्गों के कर्मचारी लगातार प्रदर्शन कर रहे हैं। इससे विपक्ष को सरकार को घेरने का मौका मिल रहा है और कर्मचारी हितैषी सरकार की छवि पर भी सवाल उठ रहे हैं।
सूत्रों के मुताबिक सरकार अब ऐसी व्यवस्था बनाने पर विचार कर रही है, जिसमें कर्मचारियों की मांगों की विभागवार निगरानी, समयबद्ध समीक्षा और समाधान हो। बेहतर प्रदर्शन करने वाले कर्मचारियों को प्रोत्साहन और पदोन्नति जैसी लंबित प्रक्रियाओं को समय पर पूरा करने पर भी जोर दिया जा सकता है।
600 अनुकंपा नियुक्तियों से सरकार ने दिया बड़ा संदेश
सामान्य प्रशासन विभाग से जुड़े सूत्रों के अनुसार सरकार ने कर्मचारी हितों से जुड़े मामलों में पहल शुरू कर दी है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की पहल पर स्कूल शिक्षा विभाग में 600 अनुकंपा नियुक्तियां की गई हैं। इसे राज्य के इतिहास में एक बड़ी पहल के रूप में देखा जा रहा है।
इसी तरह चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों की पदोन्नति में सीपीसीटी की अनिवार्यता और अन्य कर्मचारी समस्याओं पर भी सरकारलगातार क्यों भड़क रहा कर्मचारी स्तर पर विचार किया जा रहा है।
लगातार क्यों भड़क रहा कर्मचारी असंतोष?
पिछले कुछ महीनों में कर्मचारी संगठनों के आंदोलनों की लंबी सूची सरकार के लिए चुनौती बनी हुई है।
शिक्षक आंदोलन:
एमपी-टीईटी की अनिवार्यता के विरोध में शिक्षकों ने सितंबर से आंदोलन किया। भोपाल के नीलम पार्क में क्रमिक भूख हड़ताल और प्रदर्शन हुए। शिक्षक कर्नाटक और जम्मू-कश्मीर की तर्ज पर टीईटी की बाध्यता समाप्त करने के लिए अध्यादेश की मांग कर रहे हैं।
अंशकालीन और आउटसोर्स कर्मचारी:
न्यूनतम वेतन की मांग को लेकर अंशकालीन रसोइया, भृत्य, सफाईकर्मी और पंप ऑपरेटरों ने सितंबर में प्रदर्शन किया। इन कर्मचारियों ने भाजपा कार्यालय के सामने धरना देने का प्रयास भी किया।
मेडिकल इंटर्न:
मानदेय बढ़ाने की मांग को लेकर मेडिकल इंटर्न डॉक्टरों ने सितंबर में चक्काजाम और धरना दिया। 14,337 रुपये से बढ़ाकर 30 हजार रुपये मासिक स्टाइपेंड की मांग की गई। सरकार के 21,500 रुपये मानदेय के निर्णय के बाद आंदोलन समाप्त हुआ।
चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों की पदोन्नति:
22 जुलाई को राज्य कर्मचारी संघ और मध्यप्रदेश कर्मचारी मंच ने सहायक ग्रेड-3 पद पर पदोन्नति के लिए सीपीसीटी परीक्षा की अनिवार्यता का विरोध किया। कर्मचारियों का तर्क है कि इससे पदोन्नति प्रभावित होगी।
लघु वेतन और दैनिक वेतनभोगी:
जून में 15 सूत्रीय मांगों को लेकसंविदा स्वास्थ्य र लघु वेतन और दैनिक वेतनभोगी कर्मचारियों ने शक्ति प्रदर्शन किया।
संविदा स्वास्थ्य कर्मचारी:
स्वास्थ्य विभाग के संविदा कर्मचारियों ने जून से अक्टूबर तक चरणबद्ध आंदोलन किया। आंदोलनकारियों ने घेराव का प्रयास भी किया।
पुरानी पेंशन से लेकर ठेका प्रथा तक लंबी है मांगों की सूची
सरकारी कर्मचारियों की सबसे बड़ी मांगों में पुरानी पेंशन योजना बहाल करना, केंद्र के समान महंगाई भत्ता और एरियर देना, विभागों में आउटसोर्स और संविदा व्यवस्था खत्म करना तथा ई-अटेंडेंस समाप्त करना शामिल है।
यानी सरकार के सामने सिर्फ अलग-अलग विभागों की मांगों का समाधान करने की चुनौती नहीं है। उसे कर्मचारी संगठनों के बीच बढ़ रहे सामूहिक असंतोष को संभालने की भी चुनौती है।
अब आंदोलन से पहले संवाद का फॉर्मूला?
सूत्रों के मुताबिक सरकार कर्मचारी संगठनों के साथ बैठक कर एक ऐसा तंत्र विकसित करने पर विचार कर रही है, जिसमें संगठन अपनी मांगों को आंदोलन के बजाय नियमित संवाद के माध्यम से सरकार तक पहुंचा सकें।
विभागों में सीधे कर्मचारियों से फीडबैक लेने, लंबित मांगों की समीक्षा करने और उनके निराकरण की समयसीमा तय करने का मॉडल भी तैयार किया जा सकता है।
सवाल यह है कि सरकार कर्मचारियों की नाराजगी को सड़क पर उतरने से पहले कितना समझ पाती है। यदि नई रणनीति केवल आंदोलनों को रोकने तक सीमित रही तो असंतोष फिर उभर सकता है। लेकिन यदि लंबित मांगों के समाधान का स्थायी तंत्र बना, तो सरकार के लिए यह केवल आंदोलन रोकने की रणनीति नहीं, बल्कि कर्मचारी प्रबंधन का नया मॉडल साबित हो सकता है।