भोपाल। मध्यप्रदेश में मेयर, नगरपालिका और नगर परिषद अध्यक्ष से लेकर पार्षद बनने की तैयारी कर रहे उम्मीदवारों को अब चुनाव मैदान में उतरने से पहले जेब ज्यादा ढीली करनी होगी। राज्य निर्वाचन आयोग ने नगरीय निकाय चुनाव के नियमों में बदलाव करते हुए जमानत राशि में करीब 1.6 गुना बढ़ोतरी कर दी है। हालांकि महिलाओं के साथ एससी, एसटी और ओबीसी वर्ग के उम्मीदवारों को इसमें 50 प्रतिशत की राहत दी गई है।
सिर्फ जमानत राशि ही नहीं, चुनावी खर्च पर निगरानी के लिए अलग बैंक खाता अनिवार्य, खर्च का हिसाब देने की समय-सीमा तय और प्रस्तावक को लेकर भी नियम सख्त किए गए हैं। यानी अब चुनाव लड़ना सिर्फ पोस्टर-बैनर लगाने का मामला नहीं रहेगा, हिसाब-किताब भी देना होगा।
किस पद के लिए कितनी जमानत?
* नगर परिषद पार्षद — 1600 रुपये
* नगरपालिका पार्षद — 4800 रुपये
* नगर निगम पार्षद — 8000 रुपये
* नगर परिषद अध्यक्ष — 16 हजार रुपये
* नगरपालिका अध्यक्ष — 24 हजार रुपये
* नगर निगम महापौर — 32 हजार रुपये
महिलाओं तथा एससी, एसटी और ओबीसी वर्ग के उम्मीदवारों को निर्धारित जमानत राशि का सिर्फ 50 प्रतिशत जमा करना होगा।
12 साल बाद बढ़ी जमानत राशि
अब तक नगर परिषद पार्षद के लिए 1000 और अध्यक्ष के लिए 10 हजार रुपये जमानत राशि थी। नगरपालिका में पार्षद के लिए 3000 और अध्यक्ष के लिए 15 हजार रुपये, जबकि नगर निगम पार्षद के लिए 5000 और महापौर के लिए 20 हजार रुपये जमा कराने पड़ते थे।
यानी लंबे समय बाद बदले नियमों ने चुनावी मैदान में उतरने की शुरुआती लागत बढ़ा दी है।
अब ‘अपना आदमी’ नहीं, उसी निकाय का मतदाता बनेगा प्रस्तावक
नए नियमों के मुताबिक महापौर या अध्यक्ष पद के उम्मीदवार का प्रस्तावक उसी संबंधित निकाय का मतदाता होना जरूरी होगा। वहीं पार्षद पद के लिए प्रस्तावक उसी वार्ड का मतदाता होना चाहिए।
एक ही पद के लिए उम्मीदवार कितने भी नामांकन दाखिल करे, सिक्योरिटी मनी एक ही बार जमा करनी होगी।
चुनाव लड़ना है तो पहले बैंक खाता खोलिए
नए नियमों में चुनावी खर्च पर निगरानी बढ़ाने की व्यवस्था की गई है। उम्मीदवार को नामांकन दाखिल करने से पहले ही राष्ट्रीयकृत बैंक में अलग खाता खोलना होगा।
चुनाव प्रचार से जुड़े खर्च और प्राप्तियों का हिसाब इसी खाते के जरिए रखना होगा और खाते की जानकारी रिटर्निंग ऑफिसर को देनी होगी।
रिजल्ट के 30 दिन में पूरा हिसाब
चुनाव परिणाम घोषित होने के बाद उम्मीदवार को 30 दिन के भीतर चुनाव खर्च का पूरा ब्यौरा जमा करना होगा। इसमें नामांकन दाखिल करने से लेकर मतगणना तक हुए खर्च का हिसाब शामिल रहेगा।
समय पर हिसाब नहीं देने पर उम्मीदवार को भविष्य में चुनाव लड़ने से अयोग्य घोषित किया जा सकता है। हालांकि निर्धारित अवधि में आवेदन मिलने पर निर्वाचन आयोग को इस अयोग्यता को हटाने या अवधि कम करने का अधिकार रहेगा।
चुनाव खर्च की सीमा भी तय
आयोग ने अलग-अलग आबादी और पद के हिसाब से चुनाव खर्च की अधिकतम सीमा तय की है।
10 लाख से अधिक आबादी वाले शहरों में:
* महापौर — 35 लाख रुपये
* पार्षद — 8.75 लाख रुपये
10 लाख से कम आबादी वाले शहरों में:
* महापौर — 15 लाख रुपये
* पार्षद — 3.75 लाख रुपये
नगरपालिका अध्यक्ष के लिए:
* एक लाख से अधिक आबादी — 2.50 लाख रुपये
* 50 हजार से कम आबादी — 1.50 लाख रुपये
नगरपालिका पार्षद के चुनाव के लिए खर्च की सीमा 75 हजार रुपये निर्धारित की गई है।
रिकॉल की कार्रवाई के लिए छह महीने की समय-सीमा
अगर किसी निकाय में जनता द्वारा चुने गए महापौर या अध्यक्ष को वापस बुलाने यानी रिकॉल की प्रक्रिया शुरू होती है, तो राज्य निर्वाचन आयोग को सूचना मिलने के बाद पूरी प्रक्रिया अधिकतम छह महीने के भीतर पूरी करनी होगी।
वहीं किसी पद के रिक्त होने की स्थिति में संबंधित आयुक्त या मुख्य नगरपालिका अधिकारी को इसकी सूचना सात दिन के भीतर जिला निर्वाचन अधिकारी को देनी होगी।
ईवीएम पर साफ लिखा होगा—वोट किस पद के लिए
नए प्रावधानों के तहत बैलेट पेपर या ईवीएम की स्क्रीन पर यह स्पष्ट रूप से अंकित किया जाएगा कि मतदाता का वोट महापौर, अध्यक्ष या पार्षद पद के लिए है।
यानी निकाय चुनाव में अब नियम भी बदले हैं और चुनाव लड़ने की ‘एंट्री फीस’ भी।
साफ संदेश: चुनाव मैदान में उतरिए, लेकिन पहले जमानत राशि, बैंक खाता और खर्च का पूरा हिसाब तैयार रखिए।