इटारसी। रामलीला उत्सव के दौरान रामलीला मैदान और गांधी ग्राउंड में अस्थायी दुकानों के आवंटन को लेकर नगर पालिका का फैसला अब विवाद के घेरे में है। नगर पालिका सीएमओ के निर्णय के विरोध में वरिष्ठ पत्रकार प्रमोद पगारे के धरने के बाद मामला सड़क से सोशल मीडिया तक पहुंच गया है। खास बात यह है कि पगारे के लगाए सवालों पर नगर पालिका प्रशासन की ओर से अब तक कोई स्पष्ट आधिकारिक जवाब सामने नहीं आया है।
धरने को पत्रकारों के साथ पार्षदों तथा भाजपा, कांग्रेस सहित विभिन्न राजनीतिक दलों से जुड़े लोगों का समर्थन मिला।एस डी एम को मांगो का ज्ञापन दिया गया।बताया जाता है कि इसके बाद एस डी एम ने सी एम ओ से जवाब तलब किया है इसके बाद पूर्व पार्षद यज्ञदत्त गौर ने सोशल मीडिया पर नगर पालिका के पक्ष को सामने रखने की कोशिश की उन्होंने उपलब्ध अधिकृत जानकारी के हवाले से कहा कि मूंगफली, पॉपकॉर्न, भुट्टे, फुग्गे जैसे छोटे फुटकर कारोबार पर कोई रोक नहीं है और परंपरा के अनुसार उनसे महज 10 रुपये बाजार बैठकी शुल्क लिया जाएगा।
‘नया प्रयोग’...लेकिन प्रचार कहां था?
यज्ञदत्त गौर के अनुसार नगर पालिका का विचार रामलीला मैदान में 10-12 व्यवस्थित दुकानें लगाने का है। इनमें मनोरंजन, खान-पान, खेल-खिलौने आदि की अपेक्षाकृत बड़ी दुकानें शामिल होंगी। तर्क यह दिया गया कि इससे मैदान में उत्सव का माहौल बनेगा और लोगों को रामलीला देखने के लिए आकर्षित किया जा सकेगा।
उन्होंने यह भी माना कि नगरपालिका की गलती इस प्रयोग का व्यापक प्रचार-प्रसार नहीं कर पाने की रही। उनका कहना था कि यदि पार्षदों और जनप्रतिनिधियों को विश्वास में लेकर यह कदम उठाया जाता तो विवाद की जगह इसकी तारीफ हो सकती थी।
यहीं से सवाल भी उठता है—जब प्रयोग इतना अच्छा था तो इसकी जानकारी पहले परिषद और जनप्रतिनिधियों को क्यों नहीं दी गई?
पगारे बोले—‘नया प्रयोग’ नहीं, नियम पहले दिखाइए
प्रमोद पगारे ने यज्ञदत्त गौर की दलीलों को खारिज करते हुए कई सवाल उठाए। उनका कहना है कि जब सामान्य परिषद और प्रेसिडेंट काउंसिल ने ऐसा कोई प्रस्ताव पारित नहीं किया तो दुकान आवंटन के लिए टेंडर कैसे निकाला जा सकता है?
पगारे ने 10 रुपये बाजार बैठकी शुल्क को लेकर भी सवाल उठाया। उनका कहना है कि शासन की ओर से करीब तीन साल पहले बाजार बैठकी शुल्क की व्यवस्था बंद की जा चुकी है। इसके स्थान पर फुटकर कारोबारियों को छह माह की अवधि के कार्ड जारी किए जाते हैं। ऐसे में रामलीला मैदान में पुराने नियम के नाम पर 10 रुपये बाजार बैठकी शुल्क लेने की बात कितनी वैधानिक है, यह भी स्पष्ट किया जाना चाहिए।
गांधी मैदान भी सवालों के घेरे में
पगारे ने गांधी मैदान के उपयोग को लेकर भी गंभीर सवाल उठाया है। उनका कहना है कि गांधी स्टेडियम का खेल मैदान नगर पालिका द्वारा खेल विभाग को ट्रांसफर किया जा चुका है,ऐसे में वहां अस्थायी दुकानें लगाने या उनके आवंटन की प्रक्रिया शुरू करने का अधिकार नगर पालिका के पास किस आधार पर है, यह स्पष्ट होना चाहिए।
पगारे का सवाल है कि जब मैदान का हस्तांतरण खेल विभाग को हो चुका है और परिषद ने दुकान आवंटन को लेकर कोई प्रस्ताव पारित नहीं किया है, तो नगरपालिका किस अधिकार से टेंडर जारी कर रही है?
पगारे ने यह भी कहा कि नगर पालिका अब कपड़े, होजरी, जूते-चप्पल, मिठाई जैसी दुकानों की बात कर रही है, जबकि पहले ऐसी कोई स्पष्ट व्यवस्था सामने नहीं रखी गई थी।
उनका कहना है कि सीएमओ अपनी इच्छा से कोई नया प्रयोग नहीं कर सकते, उन्हें कानून और परिषद के अधिकार क्षेत्र के भीतर ही काम करना होगा।
पगारे ने यह तर्क भी दिया कि रामलीला आयोजन को दुकानें लगाकर आकर्षण का केंद्र बनाने की जरूरत नहीं है, क्योंकि वहां कोई अलग से ‘रामलीला मेला’ आयोजित नहीं किया जा रहा।
इस तरह विवाद अब केवल दुकानों की संख्या या उनके आकार तक सीमित नहीं है। बैठकी शुल्क की वैधानिकता और गांधी मैदान के अधिकार को लेकर उठे सवालों का जवाब भी नगर पालिका प्रशासन से अपेक्षित है।
‘मिसकम्युनिकेशन’ पर भी तकरार
यज्ञदत्त गौर ने पूरे विवाद को कहीं न कहीं ‘मिसकम्युनिकेशन’ का परिणाम बताया था। लेकिन पगारे ने इस तर्क को भी सीधे खारिज कर दिया। उनका कहना है कि नगर पालिका ने ऐसा कोई सार्वजनिक प्रचार ही नहीं किया था, इसलिए अब विवाद सामने आने के बाद ‘मिसकम्युनिकेशन’ कहना उचित नहीं है।
लालू गौर ने उठाया कानूनी सवाल
विवाद में लालू गौर ने भी हस्तक्षेप करते हुए कहा कि पगारे द्वारा उठाए गए सवालों का जवाब मिलना चाहिए। उन्होंने सुझाव दिया कि जिम्मेदार जनप्रतिनिधियों और पगारे को साथ बैठकर मामले का समाधान निकालना चाहिए, ताकि स्थिति स्पष्ट हो सके।
वहीं पगारे ने आरोप लगाया कि नगर पालिका अपनी गलती छिपाने के लिए भ्रामक जानकारी दे रही है। उनका सवाल है कि जब राज्य सरकार द्वारा मैदान को मेला ग्राउंड घोषित नहीं किया गया है तो वहां दुकानें किस आधार पर लगाई जा सकती हैं?
उन्होंने दुकानदारों से भी नगरपालिका की निविदा नहीं भरने की अपील की है। पगारे का दावा है कि यदि विवादित तरीके से दुकानें आवंटित की जाती हैं तो इससे जुड़े लोग भी कानूनी कार्रवाई के दायरे में आ सकते हैं।
मनीष ठाकुर ने सामने रखीं कानून की धाराएं
मामले में मनीष ठाकुर ने भी परिषद की स्वीकृति को लेकर सवाल उठाया। उनका कहना है कि नगरपालिका परिषद द्वारा रामलीला आयोजन के लिए गांधी ग्राउंड और वीर सावरकर ग्राउंड में अस्थायी दुकानों के आवंटन की निविदा जारी की गई है, लेकिन सवाल यह है कि क्या इसके लिए परिषद की शुभकामनाएं विधिवत स्वीकृति ली गई है?
उन्होंने मध्यप्रदेश नगरपालिका अधिनियम, 1961 की धाराओं का हवाला देते हुए कहा कि धारा 92 के तहत सीएमओ परिषद के विधिसम्मत निर्णयों का क्रियान्वयन करते हैं, उनके अनुसार धारा 262 नगरपालिका बाजार के स्थान, उपयोग, किराए और स्टॉल आवंटन से जुड़े अधिकारों को लेकर महत्वपूर्ण है। यदि मामला पट्टे के रूप में आवंटन का है तो धारा 109 के प्रावधान भी प्रासंगिक हो सकते हैं।
अब असली सवाल—‘दुकानें लगेंगी या फाइल खुलेगी?’
पूरे विवाद में फिलहाल दो तस्वीरें सामने आ रही हैं।
एक तरफ नगरपालिका समर्थक इसे रामलीला को भव्य बनाने का नया प्रयोग बता रहे हैं और कह रहे हैं कि छोटे फुटकर कारोबारियों पर कोई रोक नहीं है।
दूसरी तरफ पगारे और उनके समर्थक पूछ रहे हैं कि परिषद की मंजूरी के बिना ऐसा निर्णय किस अधिकार से लिया गया और मैदान के उपयोग की वैधानिक स्थिति क्या है?
यानी मामला अब सिर्फ 10-12 दुकानों का नहीं रह गया है। सवाल नगरपालिका के अधिकार, परिषद की भूमिका और सार्वजनिक मैदान के उपयोग की प्रक्रिया तक पहुंच गया है।
और सबसे बड़ा सवाल अभी भी नगरपालिका प्रशासन के सामने खड़ा है—
अगर फैसला नियमों के मुताबिक है तो परिषद की मंजूरी और मैदान के उपयोग का आधार सार्वजनिक करने में दिक्कत क्या है?
क्योंकि रामलीला के मंच पर तो भगवान राम की कथा चलेगी, लेकिन मैदान के बाहर फिलहाल ‘दुकानों का फैसला किसका?’ वाली कहानी चल रही है
Continue With Google
Comments (0)