नई दिल्ली। सत्ता के खिलाफ आवाज उठानी हो या सरकार तक अपनी मांग पहुंचानी हो, दिल्ली का जंतर-मंतर दशकों से आंदोलनों का प्रमुख केंद्र रहा है। अब दिल्ली पुलिस के नए आदेश ने इस ऐतिहासिक प्रदर्शन स्थल के भविष्य पर सवाल खड़े कर दिए हैं। गृह मंत्रालय की समिति की सिफारिश पर जंतर-मंतर को अधिकृत प्रदर्शन स्थलों की सूची से हटाने का फैसला लिया गया है। इसकी जगह रामलीला मैदान, बुराड़ी मैदान और पूर्वी दिल्ली के सीबीडी मैदान को वैकल्पिक स्थल बनाया गया है।
फैसले के पीछे वीवीआईपी सुरक्षा और संसद के आसपास व्यवस्था बनाए रखने की दलील दी गई है, लेकिन विरोध करने वाले इसे लोकतांत्रिक आवाजों के लिए सीमित होती जगह के रूप में देख रहे हैं। सवाल यह है कि क्या सुरक्षा की चुनौतियों का समाधान प्रदर्शन स्थल बदलना है या ऐसा इंतजाम करना, जिससे सुरक्षा भी बनी रहे और विरोध का अधिकार भी?
सुरक्षा के नाम पर बदला विरोध का पता
दिल्ली पुलिस के मुताबिक, संसद भवन और अन्य महत्वपूर्ण संस्थानों के नजदीक होने के कारण जंतर-मंतर पर बड़े प्रदर्शनों से सुरक्षा संबंधी चुनौतियां पैदा होती हैं। रिपोर्ट के अनुसार, हालिया प्रदर्शनों के दौरान संसद और प्रधानमंत्री आवास की ओर बढ़ने की कोशिशों ने भी चिंता बढ़ाई। इसके बाद गृह मंत्रालय की समिति ने प्रदर्शन स्थलों की समीक्षा की और जंतर-मंतर को सूची से हटाने की सिफारिश की।
अब तीन वैकल्पिक स्थलों पर प्रदर्शन की अनुमति देने के लिए संशोधित मानक संचालन प्रक्रिया जारी की जानी है।
विरोध की आवाज दबाने का आरोप
जंतर-मंतर को प्रदर्शन स्थलों की सूची से हटाने के फैसले पर सीजेपी ने तीखी प्रतिक्रिया दी है। संगठन के संस्थापक अभिजीत दीपके ने आरोप लगाया कि सरकार विरोध की आवाज दबाने की कोशिश कर रही है। उन्होंने कहा कि जंतर-मंतर को सूची से हटाया जा सकता है, लेकिन अब पूरा देश जंतर-मंतर बनेगा।
पार्टी नेता आशुतोष रांका ने भी वैकल्पिक स्थलों के चयन पर तंज कसते हुए कहा कि प्रदर्शन के लिए माउंट एवरेस्ट ही घोषित कर देना चाहिए।
सुरक्षा बनाम लोकतांत्रिक अधिकार
दिल्ली पुलिस की दलील है कि वीवीआईपी सुरक्षा और आम लोगों की आवाजाही को ध्यान में रखते हुए प्रदर्शन स्थलों का पुनर्निर्धारण जरूरी है। दूसरी ओर, आलोचकों की चिंता है कि जंतर-मंतर जैसे केंद्रीय स्थल से प्रदर्शन हटने पर आंदोलनकारियों के लिए अपनी बात राष्ट्रीय सत्ता के केंद्र तक पहुंचाना कठिन हो सकता है।
अब असली सवाल यह है कि क्या वैकल्पिक मैदान प्रदर्शनकारियों को जंतर-मंतर जैसी पहुंच और पहचान दे पाएंगे? सुरक्षा व्यवस्था बनाए रखना सरकार की जिम्मेदारी है, लेकिन शांतिपूर्ण विरोध के लिए सुलभ और प्रभावी जगह उपलब्ध कराना भी लोकतांत्रिक व्यवस्था की कसौटी है।
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