नर्मदापुरम / इटारसी //
शाम के 6 बजते हैं।रिटायरमेंट के बाद की चाय ठंडी हो रही है, अखबार में नौकरियों के विज्ञापन पर उनकी नजर अटक जाती है और वो धीरे से अपने बेटे के कमरे की तरफ देख लेते हैं। बेटा लैपटॉप बंद करके आंखें मल रहा है - आज फिर कोई जवाब नहीं आया।
माँ कुछ नहीं कहती, बस थाली में एक रोटी ज्यादा परोस देती है। उसे लगता है, भूख से तो लड़ लेगा, पर इस खालीपन से कैसे लड़ेगा?
यही वो खालीपन है, जिसे अब विज्ञान ने एक नाम दे दिया है - बुजुर्गों का अनदेखा अवसाद।

नौकरी बेटे की जाती है, नींद माँ-बाप की उड़ती है ।

हाल में 'सोशल साइंस एंड मेडिसिन' जर्नल में छपा एक अध्ययन कहता है - जब जवान औलाद के हाथ में नौकरी नहीं होती, तो उसके बुजुर्ग माता-पिता में डिप्रेशन का खतरा 12% तक बढ़ जाता है।
स्वीडन की उमेआ यूनिवर्सिटी के ऋषभ त्यागी और उनकी टीम ने भारत के 73,000 से ज्यादा बुजुर्गों के जीवन को पढ़ा। उन्होंने पाया, भारत में बेटे की नौकरी सिर्फ सैलरी नहीं है, वो बाप की पेंशन के बाद की दूसरी पेंशन है, माँ के घुटने के ऑपरेशन का भरोसा है, और समाज में सिर ऊंचा रखने की वजह है।"हमारे परिणाम दर्शाते हैं कि भारत में पीढ़ियां कितनी घनिष्ठ रूप से जुड़ी हैं। जब युवा पीढ़ी को रोजगार नहीं मिलता, तो सबसे ज्यादा असुरक्षित बुजुर्ग हो जाते हैं।"


क्यों भारत में ये दर्द ज्यादा गहरा है?
क्योंकि यहां बुजुर्ग के पास प्लान B नहीं है।
60 साल के बाद सिर्फ 18% बुजुर्गों के पास अपना हेल्थ इंश्योरेंस है। बाकी सबकी बीमा पॉलिसी एक ही है - "मेरा बेटा"
और जब समाज कहता है कि बड़ा बेटा ही बुढ़ापे की लाठी है, तो उस लाठी के हिलते ही पूरा घर हिल जाता है। अध्ययन कहता है, बड़े बेटे के बेरोजगार होने पर माँ-बाप का दिल सबसे ज्यादा बैठता है।
हम समझते हैं कि बच्चा परेशान है, पर हम भूल जाते हैं कि 60 साल की उम्र में माँ-बाप खुद से ज्यादा बच्चे के लिए डरते हैं - "मेरे बाद इसका क्या होगा?"

इस दर्द की एक ही दवा है - अकेला मत छोड़ो। 

अध्ययन ने एक बहुत खूबसूरत बात भी कही है।जो बुजुर्ग अकेले कमरे में बैठकर सिर्फ बेटे की नौकरी के बारे में सोचते रहे, वो सबसे जल्दी टूटे।और जो बुजुर्ग सुबह पार्क में दोस्तों से मिले, शाम को मंदिर में भजन गाया, मोहल्ले के बच्चों को कहानी सुनाई - वो उसी तकलीफ में भी खड़े रहे।
सामाजिक मेलजोल एक कवच है। परिवार रीढ़ है, पर समाज बैसाखी है।

आपके लिए, अगर आप उस मोड़ पर हैं...

अगर आपके घर में भी कोई नौकरी ढूंढ रहा है, तो इस बार सिर्फ रिज्यूमे मत भेजिए, घर के बुजुर्गों का दिल भी संभालिए।
बेटे के लिए: माँ-पिता को रोज बताओ कि तुम कोशिश कर रहे हो। उनकी चुप्पी को डांट मत समझो, वो तुम्हारे लिए प्रार्थना है।
बुजुर्गों के लिए: आपका मान आपकी औलाद की सैलरी स्लिप से नहीं है। आपने उसे पाल कर सबसे बड़ी नौकरी तो कर ही दी है। बाहर निकलिए, लोगों से मिलिए। आपका अनुभव ही आपके घर की सबसे बड़ी पूंजी है।
क्योंकि बेरोजगारी एक पीढ़ी की जेब खाली करती है, और दूसरी पीढ़ी का दिल। और दिल को भरने के लिए नौकरी से ज्यादा, अपनों के पास होने की जरूरत होती है।