नेचर फीचर
जिसे हम सदियों से सुरीली आवाज का ताज पहनाते आए, वैज्ञानिकों की पसंद में वही कोयल काफी पीछेरह गई,123 पक्षियों की आवाज सुनने के बाद शोधकर्ताओं ने बताया कि इंसानी कानों को आखिर किस तरह की चहचहाहट सबसे ज्यादा पसंद आती है।
नई दिल्ली//सुबह की खामोशी में किसी पेड़ से आती पक्षियों की चहचहाहट मन को अचानक सुकून से भर देती है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि सभी पक्षियों की आवाज हमें एक जैसी मधुर क्यों नहीं लगती? वैज्ञानिकों ने इसी सवाल का जवाब तलाशने के लिए 123 जंगली पक्षियों की आवाजों पर अध्ययन किया है।
जर्मनी के शोधकर्ताओं के इस अध्ययन में सामने आया कि इंसानों को कम तीव्रता और अपेक्षाकृत जटिल ध्वनियां ज्यादा पसंद आती हैं। यानी हर तेज और साफ आवाज सुरीली हो, यह जरूरी नहीं। कई बार आवाज की महीन उतारचढ़ाव और उसकी जटिलता ही उसे ज्यादा आकर्षक बनाती है।
कोयल को पीछे छोड़ गया कॉमन ब्लैकबर्ड
भारत में कोयल को लंबे समय से मधुर आवाज के लिए पहचाना जाता है। बुलबुल का नाम भी सुरीली आवाज वाले पक्षियों में लिया जाता है। लेकिन वैज्ञानिकों के इस अध्ययन में कॉमन ब्लैकबर्ड यानी यूरेशियन ब्लैकबर्ड सबसे आगे रहा।
शोध में उसे पांच में से 4.52 अंक मिले। उसकी आवाज को बांसुरी जैसी मधुर और सुरीली माना गया।
इसके बाद यूरोपीय गोल्डफिंच को 4.26, यूरोपीय रॉबिन को 4.04 और ब्लू टिट को 3.92 अंक मिले।
दिलचस्प बात यह है कि भारत में लोकप्रिय एशियन कोयल 4.13 अंकों के साथ 15वें स्थान पर रही, जबकि बुलबुल 4.26 अंकों के साथ 8वें स्थान पर रही।
किसे कितने अंक?
पक्षी रेटिंग
कॉमन ब्लैकबर्ड 4.52
यूरोपीय गोल्डफिंच 4.26
बुलबुल 4.26
यूरोपीय रॉबिन 4.04
ब्लू टिट 3.92
एशियन कोयल 4.13
बार्न आउल सबसे कम पसंद
84 लोगों ने सुनीं 123 पक्षियों की आवाजें
इस शोध में 84 लोगों को 123 जंगली पक्षियों की रिकॉर्डिंग सुनाई गई और उनसे आवाजों को पांच अंकों के पैमाने पर रेट करने को कहा गया।
नतीजे में एक दिलचस्प बात सामने आई—पक्षियों की आवाज पसंद करने के लिए यह जरूरी नहीं था कि व्यक्ति को पक्षियों की पहचान या उनके बारे में विशेष जानकारी हो,आम लोग भी इन ध्वनियों को लगभग उसी तरह पसंद करते पाए गए जैसे पक्षियों के विशेषज्ञ,वैज्ञानिकों ने पाया कि संकीर्ण आवृत्ति सीमा वाली और कम तीव्रता की ध्वनियों को अपेक्षाकृत ज्यादा पसंद किया गया।
उल्लू की आवाज क्यों लगी सबसे डरावनी?
अगर आपको रात में अचानक उल्लू की तेज आवाज सुनकर डर लगा है तो इसकी वजह सिर्फ आपका भ्रम नहीं हो सकती।अध्ययन में बार्न आउल की आवाज सबसे कम पसंद की गई इसकी तीखी और कर्कश चीख जैसी आवाज ने श्रोताओं को ज्यादा आकर्षित नहीं किया।
यानी जिस आवाज को जंगल में सुनना रोमांचक लग सकता है, जरूरी नहीं कि इंसानी कान उसे मधुर भी मानें।
पक्षियों की आवाज से जुड़ा है सुरक्षा का एहसास?
शोधकर्ताओं के अनुसार, पक्षियों की आवाज के प्रति इंसानों की पसंद का संबंध हमारे विकासवादी इतिहास से भी हो सकता है,प्राकृतिक वातावरण में पक्षियों की सामान्य चहचहाहट इस बात का संकेत हो सकती थी कि आसपास का वातावरण अपेक्षाकृत सुरक्षित है और तत्काल कोई बड़ा खतरा मौजूद नहीं है।
यही कारण है कि प्राकृतिक पक्षीध्वनियां आज भी कई लोगों को तनाव कम करने और मानसिक शांति का एहसास करा सकती हैं।
शहरों की डिजाइन में काम आ सकता है शोध
इस अध्ययन का महत्व केवल यह जानने तक सीमित नहीं है कि कौन-सा पक्षी ज्यादा सुरीला है। शोधकर्ताओं का मानना है कि इसके निष्कर्ष भविष्य में शहरों, पार्कों और ग्रीन-स्पेस की डिजाइनिंग में भी उपयोगी हो सकते हैं,शहरी नियोजन में सिर्फ ट्रैफिक और मशीनों के शोर को कम करना ही पर्याप्त नहीं हो सकता,ऐसे प्राकृतिक वातावरण तैयार करना भी महत्वपूर्ण हो सकता है, जहां वास्तविक पक्षियों की आवाजें सुनाई दें।
हालांकि शोधकर्ताओं ने एक महत्वपूर्ण अंतर भी बताया है—लाउडस्पीकर से पक्षियों की रिकॉर्ड की गई आवाज बजा देना प्राकृतिक वातावरण में पक्षियों की वास्तविक चहचहाहट का पूरा विकल्प नहीं है।
भारत में कौन-सी आवाज सबसे ज्यादा पसंद?
भारत में कोयल, बुलबुल और मैना जैसे पक्षियों को उनकी मधुर आवाज के लिए आमतौर पर पसंद किया जाता है,लेकिन वैज्ञानिक अध्ययन की यह रैंकिंग बताती है कि इंसानी कानों की पसंद सांस्कृतिक धारणा से अलग भी हो सकती है।इस शोध में बुलबुल ने 8वां और एशियन कोयल ने 15वां स्थान हासिल किया।
भारत में एक अलग प्रजाति के रूप में पहचाना जाने वाला इंडियन ब्लैकबर्ड (Turdus simillimus) भी पाया जाता है। इसे पहले कॉमन ब्लैकबर्ड की उप-प्रजाति माना जाता था यह मुख्य रूप से भारत और श्रीलंका में पाया जाता है और भारत में पर्वतीय क्षेत्रों, जंगलों तथा बगीचों में देखा जा सकता है।
असली सवाल आवाज का नहीं, माहौल का भी है
पक्षियों की चहचहाहट को लेकर यह शोध एक दिलचस्प सवाल भी खड़ा करता है—क्या हमें वास्तव में सिर्फ आवाज पसंद आती है, या उस आवाज के साथ जुड़ा प्रकृति, खुलापन और सुरक्षित वातावरण का एहसास भी हमें आकर्षित करता है?
शायद यही वजह है कि सुबह किसी पेड़ पर बैठी चिड़िया की आवाज शहर के लगातार बजते हॉर्न से कहीं ज्यादा सुकून देती है।
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